आदर्श हिमाचल ब्यूरो

 

शिमला :-पिछले दिनों मैं किसी कार्यालय गया। वहां दो कर्मचारी आपस मे झगड़ रहे थे. मालूम करने पर पता चला की झगड़ा एक कर्मचारी द्वारा दूसरे को चमचा कहने पर शुरू हुआ था । मैं सोचने लगा की लोग न जाने क्यों चमचा कहे जाने पर बुरा मान लेते हैं। हमें तो उस व्यक्ति का धन्यवादी होना चाहिए जिसने “उपयोगी” व्यक्ति को चमचे जैसा उपयुक्त प्रतीक दिया।चमचा इतनी सहजता से हमारे जीवन में प्रवेश कर गया कि पता ही नहीं चला और पूरा राज काज अपने हाथों में ले लिया।

अब देखिये न चमचा कितना उपयोगी होता है।रसोईघर मे चमचे की बड़ी बहन कड़छी के बगैर खाना तक नहीं बन सकता।खाना तो जैसे तैसे आप दक्षिण भारतीय स्टाइल मे हाथ से खा भी लें, लेकिन उँगलियाँ हर जगह चमचे की भूमिका तो नहीं निभा सकती।ऊँगली टेढ़ी कर के घी तो निकला जा सकता है, लेकिन उबलती सब्जी में मसाला तो नहीं मिलाया जा सकता । वैसे भी हाथ से खाने में वह शालीनता कहाँ जो चम्मच से खाने मे है।

      चमचा बड़ा चमत्कारी प्राणी होता है, जो सारी समस्याओं को चु।टकी बजाते हल कर लेता है | संत्री से मंत्री तक सभी इसकी जेब मे होते हैं । चमचा बड़े काम की चीज़ है ।चमचा विलक्षण बुद्धि का स्वामी होता है जो जानता है कि सूखे तिलों से तेल कैसे निकाला जा सकता है ।चमचे का प्रमुख अस्त्र है मक्खनबाज़ी यानी चापलूसी करना और यह काम चमचा इतनी खूबी से करता है कि बॉस को मक्खनबाज़ी का एहसास ही नहीं होता । चमचा बॉस की हाँ में हाँ मिलाता है और अपना उल्लू सीधा करता है । वैसे आदर्श चमचा वही है, जो दिन के समय भरपूर रौशनी मे, यदि बॉस कहे कि अँधेरा हो रहा है और चमचा लालटेन लेकर आ जाये।

चमचे के गुणों से जलकर, किसी दिलजले ने कह दिया कि – “चमचों की तीन दवाई, जूता-चप्पल और पिटाई।”
ऐसे लोग यह भूल जातें हैं कि चमचागिरी महान है, चमचा देश की शान है ।
वैसे भी मेरा मानना है कि, चमचों की पिटाई होना बहुत ही कठिन कार्य है,क्योंकि ये घर से ही पूरे शरीर में तेल लगा कर निकलते हैं । जहां भी आपने पकड़ने की कोशिश की, तो आपका हाथ फ़िसल जाता है और ये पकड़ में नहीं आते।
किसी ने कहा भी है कि चापलूसी करना कोई आसान काम नहीं हजूर, हुनर चाहिए आदमी से कुत्ता होने के लिए ।

एक चमचे से मैंने पूछा की चमचागिरी क्यों करते हो तो वह बोला कि :-
चापलूसी करने में आपका क्या जाता है ?
किसी की तारीफ़ में कुछ बोल दो, जो उसे सुहाता है
न हींग लगती न फिटकड़ी , फिर भी रंग चोखा आता है

उसने तो मुझे तो सलाह भी दी है कि सुखपूर्वक नौकरी करनी हो तो हमेशा ध्यान रखना – “बॉस इज आल वेज राईट”। “हां जी, हां जी कहना और इसी गांव में रहना”। जी हजुरी डटकर करो, भले फ़िर दूसरा काम मत करो। बॉस की नजर में हमेशा बने रहो। फ़िर तरक्की ज्यादा दूर नहीं है।

चमचे कई प्रकार के होते हैं जैसे सोने, चांदी, पीतल, स्टील के चमचे। चमचों का वर्गीकरण खानदान के आधार पर भी किया जा सकता है जैसे खानदानी, पेशेवर व् नकली चमचा। चमचा छोटा हो या बड़ा लेकिन चमचागिरी के गुणों से ओत-प्रोत होना चाहिए। कमर तक झुक कर सलाम करने वाले एवं दंडवत लेटने वाले चमचे ज्यादा पसंद किए जाते हैं । इसके लिए आपको जरुरत से ज्यादा मीठा होने की आवश्यकता है। भले ही शुगर की बिमारी हो जाए, लेकिन मीठा तो होना ही पड़ेगा। तभी तरक्की संभव है।

सफलता की सीढ़ी का दूसरा नाम चमचावाद है ।चमचावाद की महिमा अपरम्पार है । यह एक ऐसा धंधा है जिसमे बिना पूंजी लगाए पूंजीपति बनने क़ि पूरी सम्भावना होती है | दुकान, उच्च शिक्षा, दफ्तर, पूंजी किसी भी चीज़ क़ि जरुरत नहीं, बस एक व्यक्ति विशेष बॉस (मालिक) से चिपकना पड़ता है । बॉस की हाँ में हाँ मिलाकर, अपने सहयोगिओं के बारे में सही-गलत बताकर जो व्यक्ति बॉस को ख्वाबों की दुनियां में पहुंचा दे, वह सफल चमचा बन जाता है और सफलता उसके पाँव चूमती है ।चमचे समय अनुसार बॉस को बदलकर अपनी उपयोगिता बनाये रखते हैं

चमचावाद की परंपरा सदियों से चली आ रही है, हाँ इसके रूपों मे परिवर्तन होता रहा है। आखिर बादशाह अकबर के नवरतन कौन थे ? नौ चमचे ही तो थे । अंग्रेजों ने भी अपने राज्य मे चमचों को खूब बढ़ावा दिया ।चमचों के कारण ही स्वतंत्रता सेनानी पकडे जाते थे।अंग्रेजो ने चमचे के दम पर कई साल राज किया। अंग्रेज चले गए लेकिन चमचा छोड़ गए। चमचा संस्कृति आजाद भारत की उर्वरा भूमि में बड़ी तीव्रता से फली-फूली । हमारा देश तो इतना महान है कि यहाँ तो चमचागिरी करने वालों के भी चमचे होते हैं । वर्तमान युग तो चमचावाद का स्वर्ण युग कहा जा सकता है।

बिना चमचे के तो अब दिनचर्या चलाना क्या कुछ भी सोचना मुश्किल है। अत्र-तत्र-सर्वत्र चमचा ही चमचा, रसोई से लेकर सत्ता के मठ मंदिरों तक चमचे का ही राज चलता है। यह विभिन रूपों मे हर समय उपलब्ध रहते हैं।
चमचे सर्वव्यापक हैं और सर्वव्याप्त हैं। चमचों के बारे मे यह भी कहा जा सकता है कि “एक ढूढों हजार मिलते हैं, दूर ढूढों पास मिलते हैं” ।आप राजनीति, नौकरी, साहित्य, सत्ता के गलियारों में कहीं भी जाएं,हर जगह चमचे तैनात मिलेंगे। कभी भी आपने बिना चमचे की स्वीकृति से काम कराने की कोशिश की तो वे आपका बना बनाया रायता फ़ैला देंगे। कोई काम नहीं हो पाएगा। इसलिए पहले चमचे को साधना जरुरी है। बुद्धिमान व्यक्ति यही कार्य सबसे पहले करता है।
चमचा साधै सब सधै-यह मंत्र याद रखना जरुरी है।मैं तो यही सलाह दुँगां कि :-
भूल से कभी किसी चमचे से पंगा मत लेना,
बैठे बिठाये, आफ़त को दावत मत देना

कवि ने चमचे की महत्ता समझाते हुए लिखा है :-
चमचा नियरे रखिये, चमचा गुण की खान
चमचे बिन न तर सके, कोई भी श्रीमान
आप भी चमचे को अपनाइये, जीवन सुखी बनाइए |

योगेश गुप्ता

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