बजट में दोहराई पिछली योजनाएं…. शिमला की जनता को कुछ भी नया नहीं दे पाई नगर निगम 

प्रियंका चौहान 
शिमला। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी(मार्क्सवादी) ने आरोप लगाया है की शिमला द्वारा प्रस्तुत द्वितीय बजट केवल पिछले नगर निगम द्वारा प्रस्तुत बजट की ही कॉपी पेस्ट किया गया दस्तावेज हैं। पिछले नगर निगम द्वारा वर्ष 2016-17 व वर्ष 2017-18 के बजट में जिन योजनाओं की प्रस्तावना की गई थी उन्हीं का जिक्र पिछले बजट में भी किया गया था और इस वर्ष के बजट में भी अधिकांश वहीं प्रस्तावित की गई है। इससे स्पष्ट हो गया है कि बीजेपी शासित नगर निगम का लगभग गत दो वर्षो का कार्यकाल पूर्णतः विफल रहा है और शिमला शहर की जनता को कुछ भी नया नहीं दे पाई है।
             ये बजट बिल्कुल ही प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा बनाया गया आंकड़ों का केवल हेर फेर हैं। बजट में आय के स्रोतों में वर्ष 2017-18 की तुलना में 38% की गिरावट देखी गई है। क्योंकि दिसम्बर, 2016 तक नगर निगम की अपने स्रोतों से आय 5687.52 लाख रुपये थी जो इस वर्ष दिसम्बर, 2018 में गिरकर 3504.18 लाख रुपये रह गई है। जिसके चलते नगर निगम अपने नियमित व्यय को भी अपने संसाधनों से नहीं जुटा पाया है और योजना खर्च जिससे विकासात्मक कार्यो पर किये जाने वाले खर्च के लिए जमा एफ डी को तोड़कर गैर योजना खर्च जिसमें वेतन आदि सम्मिलित है किया जा रहा है। जिससे स्पष्ट है कि नगर निगम वित्तीय संकट में चला गया है। जबकि पूर्व नगर निगम के अंतिम बजट वर्ष 2017-18 को देखा जाये तो इस बजट में 4453.50 लाख रुपये का व्यय आय से कम प्रस्तावित था। जोकि सरप्लस बजट था। जबकि आज बजट में गत वर्ष की तुलना में 1607.23 लाख रुपये का घाटा दर्शाया गया है। इससे नगर निगम का वित्तीय संकट और अधिक बढ़ेगा।
                बजट में आज भी पिछले समय से चली आ रही योजनाओं का ही जिक्र किया गया है । निर्माणाधीन पार्किंग, पार्क, सामूदायिक भवन,एम्बुलेंस रोड,ओवरब्रिज आदि का ही हवाला दिया गया है परंतु कब पूर्ण होगी इसका कोई भी वचनबद्धता इसमे नहीं है। तहबाजारियों को बसाने की योजना पूरी तरह से ठंडे बस्ते में डाल दी गई है। शहरी गरीब, महिलाओं, मजदूरों के लिए जो पूर्व नगर निगम के द्वारा जो योजनाएं निर्धारित की गई थी वह बन्द कर दी हैं क्योंकि इस बजट में लेबर होस्टल के निर्माण, शहरी गरीब व महिलाओं के लिए जो प्रावधान किए गए थे उन्हें इससे हटा दिया है। युवाओं व बुजुर्गों के लिए भी बजट में कुछ भी ठोस रूप से दर्शाया नहीं गया है।
         बीजेपी शासित नगर निगम अपने कार्यकाल में केवल बीजेपी का एजेंडा ही लागू करने का कार्य करता रहा है और शहर के विकास के लिए कोई ध्यान नहीं दिया है। बीजेपी की पूर्व सरकार 2012 में भी शिमला शहर के पेयजल का निजीकरण कर रही थी जिसे पूर्व नगर निगम ने बदल दिया था और नगर निगम के अधीन ही पेयजल की व्यवस्था को रखा गया था। परन्तु वर्तमान नगर निगम ने इसे बदल कर पुनः कंपनी बनाकर निजीकरण की प्रक्रिया आरम्भ कर दी है। जिसके चलते शहरवासियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा। जोकि इस वर्ष के बजट में विकासात्मक गतिविधियों के लिए बजट अनुमानों के विवरण(पेज 36) में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि इसमें पूर्व बजट में जो प्रावधान पानी और सीवरेज के लिए रखा गया था अब यह प्रावधान ही नहीं रखा गया है। इसके साथ साथ ही पानी की दरों में वर्ष 2018 में लगभग 35% की वृद्धि कर बिल दिये जा रहे है।
        नगर निगम प्रदेश में बीजेपी की सरकार होने के बावजूद रिक्त पड़े कर्मचारियों के पद भरने में पूरी तरह से विफल रही है। वर्ष 1984 के आधार पर 950 के लगभग रिक्त पद है। परन्तु एक भी पद नगर निगम इस कार्यकाल में नहीं भर पाई है। जिसके चलते जनता को मूलभूत आवश्यकताओं के लिए परेशानी का सामना करना पड़ रहा है और निगम कर्मचारियों पर भी अतिरिक्त बोझ पड़ा है। जिसके चलते नगर निगम ने सफाई की व्यवस्था ठेकेदारों को ठेके पर दे रहा है और शिमला शहर में सफाई व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है। वर्ष 2018 में 40% तक कूड़े की दरों में वृद्धि कर जनता पर अतिरिक्त बोझ डाला गया फिर भी शहर की सफाई व्यवस्था सुचारू करने में नगर निगम विफल रहा है।
                 इस बजट में बिना धन के प्रावधान से जो नए टाउन हॉल का प्रस्ताव जो रखा गया है वह बेहद बचकाना व भ्रमित करने वाला है। तथा बीजेपी शासित नगर निगम की मानसिकता स्पष्ट करता है कि नगर निगम की संपत्तियों को अपने चेहतों को कौड़ियों के भाव मे लुटवाना चाहता है। टाऊन हाल एक ऐतिहासिक धरोहर है जिसका मालिक व कब्जा दशकों से नगर निगम का ही हैं और इसमें नगर निगम का कार्यालय ही रहा है। इसके अतिरिक्त नगर निगम टूटीकंडी व नाभा में सैंकड़ों करोड़ रुपये की जनता की  संपतियां भी अपनी चेहती संस्थाओं को लुटवाने का कार्य किया है। जोकि नगर निगम शिमला के इतिहास में एक काला अध्याय हैं और जनता के साथ धोखा है।
       बजट में स्पष्ट है कि बीजेपी शासित नगर निगम आपनी पार्टी की सरकार प्रदेश में होने के बावजूद कोई अतिरिक्त ग्रांट प्राप्त करने में पूर्णतः विफल रही है। कोई भी अतिरिक्त सहायता सरकार की ओर से नहीं मिली हैं। नगर निगम ने प्रदेश सरकार से 100 करोड़ रुपये की कैपिटल ग्रांट की मांग सदैव ही रखी है परन्तु यह पूर्ण नहीं कि गई है। हैरानी की बात तो ये है कि सांसद व विधायक बीजेपी के होने के बावजूद इस बजट से स्पष्ट हो गया है कि नगर निगम कोई भी पैसा विधायक व सांसद निधि से  लेने में पूरी तरह से विफल रहा है।
                पूर्व नगर निगम द्वारा चलाई गई योजनाओं को ही इस बजट में रेखांकित कर विकास दिखाने का प्रयास किया गया है। अपनी कोई भी नई योजना बजट में नहीं डाली गई है। अतः ये नगर निगम का बजट बीजेपी शासित नगर निगम की विफलता का परिचायक हैं और शिमला की जनता के साथ धोखा है।

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