योगेश गुप्ता

 

भारतीय राजनीति में चुनावी नारों की बड़ी भूमिका रही है । नारों के सहारे राजनेता जनता के बीच जहां अपनी खूबियों को गिनाते हैंए वहीं विरोधियों की कमियां । नारे किसी दल और उसकी सोच को जनता के सामने लाते हैं । चुनावी माहौल में आइये, एक निगाह डालते हैं उन नारों पर जो नेता से लेकर जनता के बीच काफी चर्चित रहे ।
आजादी के बाद जब कांग्रेस की तूती बोलती थीए कम्यूनिस्ट नेताओं द्वारा नारा दिया गया-

देश की जनता भूखी है, यह आजादी झूठी है
पचास के दशक में (जनसंघ संघ शक्ति कलियुगे) की अवधारणा को फैलाने लग गया ।

साठ के दशक में जनसंघ का चुनाव चिह्न दीपक था जबकि कांग्रेस का चुनाव चिन्ह दो बैलों की जोड़ी थी ।
उस समय जनसंघ ने नारा दिया- जली झोपड़ी भागे बैलए यह देखो दीपक का खेल ।
नारे के जवाब में कांग्रेस का ये जवाबी नारा था- इस दीपक में तेल नहीं, सरकार बनाना खेल नहीं ।
समाजवादियों और साम्यवादियों का नारा था – धन और धरती बंट के रहेगी, भूखी जनता चुप न रहेगी ।

1965 में शास्त्री जी के नारे जय जवानए जय किसान ने न सिर्फ़ देश का मनोबल ऊंचा किया बल्कि चुनावों में कांग्रेस को जीत भी दिलाई ।
1971 में विपक्ष ने नारा दिया- खा गयी राशन पी गयी तेल ए ये देखो इंदिरा का खेल
लेकिन इंदिरा गांधी का नारा गरीबी हटाओ पूरे देश में गूंज गया और उसने कांग्रेस को भारी विजय दिलवाई ।

1977 में कई विपक्षी दलों ने जनता मोर्चा का गठन किया जिसने इंदिरा हटाओ,  देश बचाओ और ष्संपूर्ण क्रांतिष् जैसे नारों के साथ प्रचार किया) दूसरी और कांग्रेस ने विपक्षी पार्टियों के गठबंधन क मज़ाक उड़ाते हुए, इंदिरा गांधी के लिए इस नारे को बनाया था –एक शेरनी – सौ लंगूरए चिकमंगलूर भाई चिकमंगलूर ।

उसी समय, आपातकाल और नसबंदी अभियान के खिलाफ ये नारा भी काफी चर्चित हुआ-
जमीन गई चकबंदी में, मकान गया हदबंदी में,
द्वार खड़ी औरत चिल्लाए, मेरा मरद गया नसबंदी में ।

जब इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गईए 1984 के चुनाव में कांग्रेस ने इस नारे को इस्तेमाल किया –
जब तक सूरज चांद रहेगा, इंदिरा तेरा नाम रहेगा ।
तब संवेदना की लहर पर बैठ कर कांग्रेस ने रिकॉर्ड जीत दर्ज की थी

1989 के चुनावों में वीपी सिंह को लेकर बना यह नारा काफी चर्चित रहा –
राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है
1992 में राम मंदिर आंदोलन के दौर में भाजपा और संघ का नारा था-
सौगंध राम की खाते हैं,हम मंदिर वहीं बनाएंगे
रामलला हम आएंगेए मंदिर वहीं बनाएंगे

1996 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस द्वारा नारा दिया गया –जात पर न पात पर मुहर लगेगी हाथ पर ।
भाजपा 1996 में वाजपेयी की भ्रष्टाचार मुक्त छवि को लेकर बनाए गए नारों के साथ सत्ता में आई थी । भाजपा कार्यकर्ताओं का प्रिय नारा था – सबको देखा बारी-बारी, अबकी बार अटल बिहारी।
2004 में कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ- नारा प्रभावी रहा
2014 में भाजपा ने नारा दियाए श्श् बहुत हुई महंगाई की मारए अबकी बार मोदी सरकारश्श् जो पार्टी की विजय का कारक बना । इस नारे को एक दूसरे चुनावी नारे श्अच्छे दिन आने वाले हैं का साथ मिला था
अब भाजपा नारा दे रही है, फिर एक बारए मोदी सरकार और मोदी है तो मुमकिन है ।

बसपा और सपा में जब गठजोड़ नहीं थाए तब बसपा का नारा था-
चढ़ गुंडन की छाती पर मुहर लगेगी हाथी पर ।
अब बसपा व् सपा के गठजोड़ के बाद विरोधी नारा लगा रहे हैं –
गुंडे चढ़ गए हाथी परए गोली मारेंगे छाती पर ।

कुछ सदाबहार नारों भी हैं –
गली गली में शोर है, ……… चोर है ।
जीतेगा भाई जीतेगा, ……… जीतेगा
बस नारे में …….. की जगह उमीदवार या पार्टियों के नाम बदलते रहते हैं ।
निर्दलयी भी नारा देने में पीछे नहीं हैं और कहते हैं -.
सभी दलों में दल दल है, सबसे अच्छे निर्दल हैं ।

उपरोक्त नारों के बीचए मुझे कवि धूमिल जी के ये पंक्तियाँ याद आ रही हैं –
एक आदमी
रोटी बेलता है
एक आदमी रोटी खाता है
एक तीसरा आदमी भी है
जो न रोटी बेलता हैए न रोटी खाता है
वह सिर्फ़ रोटी से खेलता है
मैं पूछता हूँ..
श्यह तीसरा आदमी कौन है घ्श्
मेरे देश की संसद मौन है।

इसलिए जनता को चाहिए की –
वोट करें ईमानदारी से, चयन करें समझदारी से
लोकतंत्र में हिस्सेदारी, वोट डालना जिम्मेदारी । लोकतंत्र में हिस्सेदारी, वोट डालना जिम्मेदारी

 

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