योगेश गुप्ता

 

          है बजा चुनाव का बिगुल, आये दिन वोट मांगने के
          चिकनी चुपड़ी बातें करके, जनता को लुभाने के
         वादे पर वादे करकेए ऊंचे ख़्वाब दिखाने के
        लोक लुभाने वादे करके, सत्ता को हथिआने के

चुनाव लोकतात्रिक शासन का आधार है। लोकतंत्र में लोक की बात उसके द्वारा चुने गए प्रतिनिधि करते हैं। प्रतिनिधि चुनने का काम चुनावों के माध्यम से किया जाता है। निर्वाचन प्रक्रिया को लोकतंत्र की नींव भी कहा जा सकता है। वर्तमान समय में लोकतंत्र की यह बुनियाद बहुत मजबूत नहीं दिखती है। इसका कारण निर्वाचन प्रक्रिया का अत्यधिक खर्चीला होनाए बाहुबलियों का दखल एवं कुछ नीतिगत खामियां है। सुधार एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। भारतीय लोकतंत्र में भी कुछ चुनाव सुधारों की आवश्यकता है। उनमे प्रमुख हैं-

लोक सभा और राज्य विधानसभा चुनाव एक साथ –

एक राष्ट्र, एक चुनाव  से चुनावी खर्चे, समय व् कीमती संसाधनों को बचाना मुमकिन हो सकेगा और देश को चुनावी माहौल की चलने वाली निरंतर प्रक्रिया से अलग किया जा सकेगा। बार-बार चुनाव होने से आचार संहिता आदि के कारणए विकास की रफ्तार में बाधा आती है। चुनाव एक साथ होने से चुनाव बोझ नहीं बल्कि एक शासकीय समारोह लगेगा।

 एक से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव पर रोक-

आज कोई प्रत्याशी एक से अधिक क्षेत्रों से चुनाव लड़ सकता है। जिससे पुनः चुनाव कराने की आवश्यकता पड़ती है। बार बार होने वाले चुनावी चुनावी खर्चे को और समय व् संसाधनों की बर्बादी कम करने के लिए यह आवश्यक है कि कोई भी प्रत्याशी केवल एक ही क्षेत्र से चुनाव लड़ सके।

सभी चुनावों की समान मतदाता सूची –

पंचायत चुनावों से लेकर देश के आम चुनावों तक के लिए एक ही मतदाता सूची होनी चाहिए। जिससे खर्च में भी कमी आएगी साथ ही गड़बड़ी की भी संभावना भी कम होगी।

दोषी सिद्ध होने पर सदस्यता निरस्त

वर्तमान में यदि सांसद, विधायक अदालत द्वारा दोषी करार दिया जाता हैए तब भी वह अपना कार्यकाल पूरा करता है। अदालत द्वारा दोषी करार दिए जाने पर तत्काल प्रभाव से संबंधित सदस्य की सदस्यता रदद हो जानी चाहिए।

 नेताओं के लिए अधिकतम उम्र 

आयु सीमा जब सुप्रीम कोर्ट के जजों तक के लिए है तो फिर राजनेताओं के लिए क्यों नहींघ् मंत्री बनने के लिए न्यूनतम शैक्षिक योग्यता व् अधिकतम उम्र भी निर्धारित की जानी चाहिए।

आरक्षित चुनाव क्षेत्रों में बदलाव –

आरक्षित चुनाव क्षेत्रों के समीक्षा समय समय पर की जानी चाहिए और समग्र क्षेत्रों के विकास के लिए इनमे प्रत्येक 10 वर्ष बाद परिवर्तन होते रहना चाहिए।

सदस्यों के वेतन – भत्तों का निर्धारण वेतन आयोग द्वारा

संसद और विधान सभा सदस्यों के वेतन .भत्तों का निर्धारण वेतन आयोग द्वारा किया जाना चाहिए। वर्तमान में माननीय स्वयं के लिए मतदान करके मनमाने ढंग से अपने वेतन व भत्तों में वृद्धि करते रहे हैं।

इलेक्ट्रॉनिक्स वोटिंग का प्रावधान 

रोजगार (नौकरी , व्यवसाय)  के कारण लोग घर से लंबी दूरी के कारण चाहकर भी वोट नहीं डाल पाते।इलेक्ट्रॉनिक्स वोटिंग (नेट बैंकिंग ,ऑन लाइन टिकट बुकिंग की तर्ज पर) ऐसे सभी लोगों के लिए सहायक होगा। मतदाता की प्रमाणिकता सुनिश्चित करने के लिए इण्वोट को सरकारी दस्तावेजों (पैन, आधार)  के साथ जोड़ा जा सकता है। धोखाधड़ी को रोकने के लिए ई.वोटिंग मशीनों को जिला के चयनित प्रमुख स्थान पर स्थापित किया जा सकता हैए जहाँ मतदाता अपना पहचान प्रमाणित कर मतदान कर सकते हैं।

संसद और विधान सभा सदस्यों की पेंशन स्कीम को तर्कसंगत बनाया जाना चाहिए –

देश में लोकसभा का चुनाव एक बार भी जीत जाने और एक दिन के लिए भी संसद का सदस्य बन जाने के लिए पेंशन दिए जाने की व्यवस्था है। कोई व्यक्ति पहले विधायक रहा हो और बाद में सांसद भी बना हो तो उसे दोनों की पेंशन मिलती है। संसद में सेवा करना एक सम्मान है, धन कमाने का साधन नहींए इसलिए माननीयों की पेंशन के लिए कोई न्यूनतम सदस्यता अवधि निर्धारित की जानी चाहिए ।

राजनीतिक पार्टियों को उनके चुनावी घोषणापत्र के प्रति जवाबदेह बनाया जाए –

जवाबदेही न होने के कारणए अधिकांश राजनैतिक दल कर्ज माफीए मुफ्त खाना, बिजली व् मुफ्त आय के खोखले वादे करए भोली भाली जनता को बेवकूफ बनाते रहते हैं।

 चुनावी मौसम के बारे कहा गया है – 

            वादों की बौछार हैए नारों की बरसात ।
            यह मौसम की बात हैए बाद किसे है याद

अगर घोषणा पत्र को क़ानूनी रूप दिया जाये और चुनावी वादा पूरा न करने पर जिम्मेदार पार्टी और नेताओं के चुनाव लड़ने पर रोक लगाई जायेए तो निश्चित ही प्रत्येक दल को चुनावी घोषणाएं सोच समझ कर करनी पड़ेगी और जनता सही सरकार चुनेगी। बिना जवाबदेही और ठोस योजना के बगैर विकास और गरीबी मिटाने जैसे किये गए खोखले वादों के बारे में तो सिर्फ इतना कहा जा सकता है –

          गरीबी को मिटाने कीए बातें सिर्फ बातें हैं
          जो खुद दौलत के भूखे होंए वो गरीबी क्या मिटायेंगे
          गरीबों का लहू तो, नेताओं की कार का ईंधन है
          गरीब मिट गई तो ये क्या रिक्शा चलाएंगे ।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here