हमीरपुर से तीन बार सांसद रहे अनुराग ठाकुर के लिए इस बार जीत की राह आसान नहीं है। उनके रास्तो पर कांटे बेशुमार है। ये कांटे विपक्ष से ज्यादा अपनों के बिखरे लगते है। ऊपर से तो फूलों की तरह लगते है।लेकिन अंदर से ऐसे चुभ रहे है कि एक खास मुहिम “अनुराग हार रहा है टिकट कट रही ” बड़े पहले से चल रही है। 2017 में सुजानपुर से जब प्रेम कुमार धूमल जी को हार का सामना करना पड़ा था तो ये मुहिम काफी तेज हो गई थी।

अजय बन्याल दैनिक जागरण शिमला के जिला प्रभारी हैं। यह लेख इन्हीं के फेसबुक वाल से साभार लिया गया है।0

लेकिन जैसे चीफ व्हिप की कुर्सी पर अनुराग की तैनाती हुई तो भीतर खाते अनुराग के बढ़ते कद से परेशान होना शुरू हो गए। प्रेम कुमार धूमल जी ने पिछले एक साल से चुप्पी साधे रखी है। इस चुप्पी से बड़े बड़े को जवाब नहीं मिल पा रहे है। सरकार के भीतर भी धूमल कैंप को हाशिये पर ले जाने की चर्चाएं आम है।।अनुराग के विरोध का सबसे बड़ा कारण परिवारवाद माना जाता है इसके साथ ही दिल्ली में व्यस्त रहने के तर्क भी उनके विरोधी देते रहते है। मगर काम के मामले अनुराग के कद पर बोलने से कन्नी काट लेते है। हमीरपुर संसदीय सीट बीजेपी का गढ़ रहा है। अनुराग ने खेल महाकुंभ, सांसद अस्पताल सेवा, सांसद भारत दर्शन, 12 से अधिक निजी बिल संसद में पेश करने , रेलवे का विस्तार करने, सेंट्रल यूनिवर्सिटी का मामला, एम्स के शिलान्यास, हाइड्रो इंजीनियरिंग कॉलेज, ऐसे काम है जो चल रहे है। लेकिन कहते है कि अभी ज़मीन पर ज्यादा उतरे नहीं है। मगर अन्य तीन सांसदों के कार्यो की ओर नजर दौड़ाए तो किसी ने बस को हरी झंडी दी, तो किसी ने सिलेंडर, इंडक्शन बांटे है। इन सब के बाद अनुराग को विरोध का सामना सबसे अधिक करना पड़ रहा है। अगर अनुराग जीतते है तो नमो की जीत का तर्क दिया जाएगा और अगर हारते है तो अनुराग की नाकामी बताई जाएगी। सबसे सक्रिय रहने के बाद अनुराग को इस चुनाव में अब तक चुनावों से ज्यादा मेहनत करनी होगी। अब देखना है कि इस बार भी बीजेपी की झोली में सीट जाएगी या फिर कांग्रेस लंबे समय बाद अपना खाता खोल पाएगी।
मेरे हिसाब जीत इस बार भी होगी।

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